प्राप्त रिपोर्ट के मुताबिक़, मोहर्रम की चाँद रात को इराक़ के पवित्र नगर कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के श्रद्धालुओं की मौजूदगी में रौज़े के गुंबद पर काला परचम लगाया गया। इसके साथ ही इमाम हुसैन की ज़रीह पर भी काली चादर चढ़ा दी गई। वहीं ईरान के पवित्र नगर मशहद में स्थिति इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम के रौज़े पर भी काले परचम लग गए हैं। 20 अगस्त का सूरज जैसे ही ढला और मोहर्रम का चाँद दिखाई दिया वैसे ही पूरी दुनिया में मौजूद इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके परिजनों एवं साथियों के चाहने वालों की आंखों में आंसू भर गए, हर ओर से एक ही आवाज़ आ रही थी लब्बैक या हुसैन लब्बैक या हुसैन। भारत और पाकिस्तान में भी मोहर्रम का चांद नज़र आते ही इमाम हुसैन (अ) के चाहने वालों के घरों में ग़म का फ़र्श बिछ गया। शहरों, गावों के इमामबाड़ों से या हुसैन की आवाज़े साफ़ सुनी जा सकती हैं। भारत के सभी छोटे बड़े शहरों में मजलिस और मातम का सिलसिला पूरी श्रद्धा के साथ शुरू हो गया है।
याद रहे कि इस वर्ष कोरोना महामारी की वजह से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में काफ़ी बदलाब किए गए हैं। लेकिन इन सबके बावजूद कर्बला के शहीदों का ग़म मनाने वाले दुनिया भर के श्रद्धालु सभी तरह के स्वास्थ्य संबंधित दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए अपने शोकसभाओं का आयोजन कर रहे हैं। इस बार दुनिया भर में ज़्यादातर मजलिसे सोशल मीडिया के ज़रिए ऑन लाइन हो रही हैं। वरिष्ठ मुस्लिम धर्मगुरुओं ने भी इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के श्रद्धालुओं से अपील की थी कि इस बार कोविड-19 की वजह से मोहर्रम में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों पूरी सतर्कता के साथ मनाएं, ताकि दुनिया के सामने एक नमूना पेश किया जा सके।
उल्लेखनीय है कि मोहर्रम शुरु होते ही दुनिया भर में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के श्रद्धालु मस्जिदों, इमामबाड़ों, पवित्र स्थलों और अपने घरों पर काले झंडे लगा कर शहीदों के सरदार इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। कर्बला की त्रासदीपूर्ण घटना और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम तथा उनके वफ़ादार साथियों की शहादत को शताब्दियां बीतने के बाद भी न सिर्फ़ यह कि इस घटना का महत्व कम नहीं हुआ बल्कि दिन प्रतिदिन कर्बला का संदेश पूरी दुनिया में व्यापक स्तर पर फैलता जा रहा है और इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की याद में शोक समारोह भी व्यापक स्तर पर आयोजित हो रहे हैं। मोहर्रम इस्लामी कैलेंडर का वह महीना है जब हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने इराक़ में स्थित कर्बला के मैदान में सच और झूठ, ज्ञान और अज्ञानता, हक़ और बातिल के बीच अंतर करने के लिए महान बलिदान दिया। इसलिए इस इस्लामी कैलेंडर के पहले महीने को इमाम हुसैन (अ) की शहादत से ही पहचाना जाने लगा। हज़रत इमाम हुसैन (अ) की शहादत का उद्देश्य इतना बुलंद है कि आसानी से कोई उसे समझ नहीं सकता। करबला वालों के महान बलिदान और शहादत ने दुनिया वालों के सामने ज़ालिम और मज़लूम के बीच हमेशा के लिए लकीर खींच दी।
पार्स टुडे हिन्दी सेवा इस दुखद और ग़म के अवसर पर अपने सभी श्रोताओं, पाठकों और इमाम हुसैन (अ) के श्रद्धालुओं की सेवा में संवेदना और शोक व्यक्त करता है।